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गणेश चतुर्थी

Saturday, 12 September 2026

  




सजी हुई फूलों से चौकी,
पीतल के दीये की आरती
मोदक की मीठी सी ख़ुशबू,
“बप्पा मोरिया” - गूंज उठाती


माटी की इस मूरत में ही,
सारा संसार सिमट आया
घर का हर एक कोना जैसे,
इस पावन रूप से हर्षाया।


जीवन के संकट को हरने,
विघ्नहर्ता आते हैं,
मोहित सी झलक, माथे पर तिलक
रिद्धि-सिद्धि लाते हैं।


विसर्जन का जब दिन आए,
आँखें नम, मन शांत होगा,
विनायक पर विश्वास रखकर,
नया सफ़र आसान होगा।

 


 

मेरी कहानी !

Sunday, 26 July 2015


आज कोई बात हो जाने दे 
वही संगीत, बज जाने दे
रिश्ता रहा अधूरा अब तक
साँसों को अब, मिल जाने दे

देखीं हैं दो आँखें जब से
मन ही चमक उठा है तबसे
बहुत अधिक गहराई पाकर
अपनी - सी लगतीं मुझको कबसे

आज फिर नई शाम आई है
मचलते हुए से काम लाई है
मेरी कहानी पूरी करने 
का इंतज़ाम कर आई है

फिर वही धुन बजेगी अब तो
और वही शख्स मिलेगा
जिसको सब दे बैठी हूँ मैं
मुझे मेरा अक्स मिलेगा। 

उससे मेरा रिश्ता सुहाना
सदियों से था हमने ठाना
मिलेंगे हम कभी भी पर
छोड़ के कहीं दूर न जाना। 


कुछ बाकी है...




हो रहा है मन कि मुँह को मैं खोलूँ
आपके सामने अब, सब कुछ बोलूँ
आँखें हैं नम, क्यों समां है सूना - सा
देखलो इधर, तो मैं शब्दों को तोलूँ

लग रहा है होंठों की सिलाई को उधेडूं
प्रीतम के पास बैठ, उसको मै छेड़ूँ
क्या पता, क्या होने को है
अब तो अपने मुंह का ताला मैं तोड़ूँ।

आँखें नहीं कह पाईं हैं आज तक
कहा, पर इकरार तो अब भी बाकी है
आप पर इतना ज़ुल्म किया हमने
क्या कहना, इज़हार तो अभी भी बाकी है।

बेक़रार - से इस दिल में एक तड़प उठती है
छाया बड़ी देर से मिली नहीं
छोड़ दिया है तरकश कहीं तीरों का
कि ऑंखें अब ज़्यादा तकलीफ करतीं नहीं।

आपसे बयाँ करना होगा शब्दों में ही
समझ कर भी नासमझी दिखा रहे हैं
भाषा चाहे कहूँ या न कहूँ
मन की बातों में मुझे क्यों उलझा रहे हैं ?

तारीफें तो मिलती हैं आपसे ही
एक बार बेक़रार तो होकर देखिए
मेरी 'हाँ' का यूँ ही इंतज़ार किया करते हैं
एक बार इज़हार तो कर के देखिए


चाहे जो आए...




तेरे हाथ में जीवन मेरा 
तेरे दर पर जान है
तरसूँ  जिसके लिए ही अब मैं 
उसपे जाँ कुर्बान है। 





तू है दाता, सब है तेरा 
देता क्यों नहीं मुझे बसेरा
मुझे तो उसका साथ चाहिए
मांग रही हूँ जो है मेरा। 







तूने क्यों सपने दिखलाए
ख्वाबों में अपने मिलवाए 
उसे रात दिन याद हूँ करती
काश की वो मेरा कहलाए। 






उससे जो एक डोर बँधी है
कितनी लम्बी खिंच सकती है
इतनी दूर जाकर के भी
मन को  लगता, वो पास बुलाए। 







बहुत समय हो गया, बिन मिले 
अनदेखा सा लगता है दिल 
क्या मज़बूरी है अब तेरी
कह दे उससे पास में आए। 






थोड़ा और सब्र कर लूँगी 
तेरी बात मई समझ गई हूँ
सही समय के आने पर ही 
मिलेंगे हम, चाहे जो आए।  







तन्हाई

Wednesday, 28 January 2015


तन्हाई है कुछ यूँ इस तरह
 दामन से जुड़ी !
सांसें दे कर भी, अनजानों की तरह
जान ले रही !
बदलता है मौसम हर रिश्ते का
कुछ इस तरह,
कि पता नहीं चलता कब पायल बजी
कब चूड़ी टूट गई !

टुकड़ों में बंट गया हर वो सपना,
जिसे देखा मैंने, समझकर सबको अपना।
तन्हा-तन्हा वो हर पल बन गया,
बेखबर-सा नशा मेरे सफ़र में मिल गया।

कबसे बैठा था ये दिल, चाहत के इंतज़ार में
मिले हमें सभी से काँटे उधार में !
जिसकी तौहीन भी न कर सके कभी हम
उसने दे डाले जंज़ीर  के निशान हाथ में ...

ठहरा नहीं कुछ भी, पर घाव के निशान हैं  ...
मिट जाएँगे ये भी, ये सब इम्तेहान है  ...
मर्ज़ी जो चलती है रब की यहां पर,
यह जानने वाला मिटता नहीं, देता बलिदान है।

व्यथा तो हमसे दूर जाती नहीं, जैसे अड़ी हो यहीं-कहीं
चुभन भी कुछ ज़्यादा करीब रहती है आजकल
जुदाई को हो रहा है लगाव ठहरने से
इनकी करीबी इतनी क्यों खेल रही है हमसे ?

बहकते नहीं हैं कदम, फिर भी, न जाने क्यों
दर्द का आलम रहता है दिल पर !
सब्र का तूफ़ान चल चुका है सीने में 
गुज़र जाएगा ये समां, देखते हुए खिड़की पर  ...

इन रिश्तों की डोर इतनी कमज़ोर भी नहीं,
कि छूटे और टूटने को भागे -
कुछ तो खता हुई होगी हमसे-तुमसे,
कि हर बात अब ज़हरीलेपन में सबसे आगे !

क्यों है खामोश इन सितारों की चादर में समां ?
क्यों है मदहोश, कुछ गुमशुदा-सा ये कारवां ?
ऐसे किसी बदलाव की जड़ तो दिखती भी नहीं,
धुँए में लिपट गया है, जाड़े का दिल जवां  ...

कभी तो हो नया बसेरा इस जहाँ में,
पहचान हो एक-दूसरे से सबकी यहाँ,
निराशा कभी तो छोड़े उजाले का साथ,
और चल पड़े फिर एक हरी-भरी दास्तां।

जगत को मुक्ति मिल जाए पापियों से,
जान गँवाने की वजह न मिले हमें,
हो जाए सवेरा रिश्तों का भी एक पल में,
बलाएँ टलने की चिंता न करनी पड़े हमें। 

है जो ये खूबसूरत-सी कहानी का ख्वाब -
काश ! सच हो जाये इस ही दुनिया में।
बंधन को बांधना मुश्किल न रहे,
बदलाव हानि न पहुचाएं जनता में।

खुशगवार रहे हर आंधी के बाद की बारिश,
रहे सदा स्वच्छ हर नज़र,
देखें खुद को आईने में पहले,
मन में विश्वास जगाएँ हर पहर।

तन्हा न हो जाएँ सभी रिश्ते यहाँ,
हो मर्यादा हर इंसान की ज़ुबाँ में,
बेखबर रहे न लोग मित्रों से भी,
कुछ ऐसे बने नया स्वर्ग हमारी शान में  ...

जर्जर वकील

Wednesday, 14 January 2015


यूँ ही बैठा करते हैं अदालतों के शोर में
कि पैर बस भागने को उठ खड़े होते हैं

जहाँ बैठ मैं हर हकीकत से रूबरू हुआ
वहीँ उम्रकैद के फैसले पड़े होते हैं

हर नई उलझन कुछ ऐसी साजिश चलती है
उस माहौल में सारे सवाल अड़े होते हैं

क्या पता, रूह कहाँ पड़ी मिलेगी
लालची झूठ के पैगाम ज़्यादा बड़े होते हैं

दिन ढलता है, बात ख़त्म नहीं होती
बाहर देखो, चाय - पानी के इंतज़ाम खड़े होते हैं

वक़्त के साथ, मानवता भी मुरझा गई
इस पेशे में सारे मुकाम गिरे होते हैं

कहाँ मिलेगा न्याय, सफ़र बहुत बड़ा है
सबूतों की गड्डी लिए, बाहर अफसर खड़ा है

तेरी आँखों में धूल झोंकने आया हूँ
बोल तेरे इमान को कितने में नीलम करूँ ?

हर सच्चाई पर परतें पड़ गईं
परतों के भीतर बच्चे पल रहे होते हैं। 
 

क्यूँ हुईं आँखें नम और खामोश ज़ुबाँ ?


आँखें थीं नम और ज़ुबाँ थी खामोश
हर अश्रु के साथ, हर आह बह गई
ख्याल रखा उन्होंने इस दिल का सही तरीके से
कद्र करने में यूँ डूबे, कि बाहर आना भूल गए। 

देखा फिर हमने उन्हें, इन ठहरे झरोखों से
महसूस किया यूँ कि रच गए लहू में
सोचा था बहुत कुछ, आँखें न कह पाईं पर
ठहरा तो हर इक पल था, ओट में छिपकर चुपके से। 

दीदार किया उन्होंने जो, लज्जा ने घेर लिया
इज़हार और इकरार में दूरी न रह गई
इसलिए हुईं आँखें नम और खामोश ज़ुबाँ
वो हमारी ज़मीन हैं, और हम आसमान। 

शर्मीली

Saturday, 11 October 2014



वह क्यों यूँ शर्मा जाती है
क्यों इठलाती, इतराती है
पल भर में साया-सा दिखता
 छुपती है और मुस्काती है।

वह क्यों पास नहीं आती है
लाज से, देखो - बलखाती है
सुंदर युवती का मन है कि
नटखट नयन मिला जाती है।

पलकों के नीचे क्यों रंग है
गाल शर्म से लाल हो रहे
आहट सुनकर भागी जाती
केशों को लहरा जाती है।

उलझे-सुलझे बादल-से क्यों,
बाल हैं उसके घने-घने
पतली-पतली उँगलियों से
जल छिड़काकर उड़ जाती है।

धीरे से क्यों मुस्काती है
पलकें नीची किए शरम
गर्दन अपनी हिलाएगी फिर
चाल चलेगी बड़ी नरम।

चुपके से फिर भागेगी वो
दूर कहीं क्यों छिपती है
समझ नहीं पाई मैं अब तक
भाई से क्यों वो डरती है !!!

इश्क़ की वजह मिली...

Monday, 6 October 2014



नया समां है, इश्क़ नया है
आहिस्ते चलने की वजह मिली
कैसे सुनाऊँ मैं ये दास्ताँ
खामोशियों में पनाह मिली

जिस रास्ते पर तू मिला
साथ में फिर तू चला
उस राह पर बार-बार
चलने की वजह मिली


हर जीत जो मिली है उसमें
पल-पल तेरा प्यार समाया
इसी इश्क़ के कारण ही तो
दुआओं को मेरी, सफलता मिली

ठहरा तो हर एक पल था
जब तूने यूँ देखा था
ओट में छिपकर चुपके से
देखने की वजह मिली




महसूस करने लगी तुझे
हर लम्हे, हर ख्वाहिश में
तेरे जान लुटाने से
खूबसूरत लगने की वजह मिली

सोचती हूँ कई बार
आँखों से कहूँ, या ज़ुबाँ पर रखूँ
नज़रें नहीं उठ पाती हैं
मुँह की कलम, खाली मिली

हैं सभी परेशान मुझसे
मेरी आदतें हैं बदलीं
लोक-लाज और मर्यादा
की बातें दुश्मन ज़माने से मिलीं

फिर भी मुझको दुःख नहीं
तुझे याद करके है सुकून
तेरी बाहों में ही मुझको
सबसे प्यारी जगह मिली


क्या पता, तुझे चाहने की
सज़ा मिले या प्रशंसा
इन सब को दूसरी दुनिया में
भेज कर मुझे शान्ति मिली

तुझे चाहने का जी करता है
इधर-उधर जाऊँ तो भी
दिल बस यही सोचता है
कि रहने के लिए अब जगह मिली

तेरे साथ ही चलना है मुझको
तेरे साथ ही झड़ना है
तेरे पास में आने से
साँसों को जैसे राहत मिली।


खुद को मैंने सबका बताया...


मेरे आस-पास कुछ लोग रहते हैं
रहते हैं कई, पर कुछ ये कहते हैं
किसी को भी बना सकती हो दोस्त
किसी से भी कर सकती हो बातें
मन है साफ़ तुम्हारा जिसमें
हिम्मत करती हैं, दया-प्रेम की बातें

कुछ लोग मुझसे यह भी कहते हैं
दोस्त तुम्हारे हाथ में नहीं रहते हैं
यदि किसी ने तुम्हें धोखा दिया
तो उस दिन तुम्हें बड़ा मज़ा आएगा
जब कोई बड़ा , उन्हें मज़ा चखाएगा
और तुम्हारी हिम्मत के पेंच कसवाएगा

कुछ यह भी कहते कि जब तुम
उछलती-कूदती हो, अच्छी लगती हो
मुंह चिढ़ाकर, नज़र बचाकर, भागती हो
शैतानी करती हो, बच्ची लगती हो
जब बात मनवाने की ठान लेती हो
तभी उम्र की कच्ची लगती हो

पर कुछ दोस्त यह भी कह गए
शांत स्वभाव व सरल मिजाज़ की
यह है मूरत शालीन स्वभाव की
समझदार हो, आज्ञाकारी
करती हो बातें - सही अंदाज़ की
शर्मीली हो पर तेज़ दिमाग की

लोग यह नहीं समझ पाते हैं
कि समय के अनुसार बदलाव, स्वभाव में आते हैं
मैं तो बिलखते सुख में खुश होकर
रोते हुए भी चुभते आंसू पी सकती हूँ

मेरे व्यवहार से वह भी चुप है
जो मुझे तंग करने के बाद सम्भल गया

चुप रहकर ही आदर्शों की
सलाह को अपना मार्ग बनाया
सभ्य समाज में जीना सीखकर
हर इंसान को दोस्त बनाया
चाहे नर्मी हो या गर्मी
खुद को मैंने सबका बताया।

करी है दुआ !


हाथ जोड़कर
शीश झुकाकर
करी है दुआ

तेरे लिए ही
हर पल जीतने की
करी है दुआ

हर दम जिए तू
चाहे जो तू ,
मिले तुझे
करी है दुआ

तू कुछ ख़ास है
तू मेरे पास है
करी है दुआ

जो तूने कहा,
जो चाहा,
उसे पूरा करने की
करी है दुआ

बस तू आए
हर दिल में छाए
करी है दुआ



तुझमें ही मैं हूँ
मुझमें रहे तू
करी है दुआ
   
 

 
भूलना नहीं है तुझे
मेरे लिए है तू
करी है दुआ

तेरे लिए ही उसने
मुझको भेजा, जब
करी है दुआ।

किसे बुलाएं ?

जब होगा सुनसान अँधेरा
जमा हुआ भूतों का डेरा
तो हम भी भूत बन जाएँ
रौशनी करके किसको जगाएँ?

सब तो ठहरे हैं ये कायर
बुलंद आवाज़ कहाँ से लाएँ?
चाहते तो हम भी हैं पर
कमान चढ़ाने किसको बुलाएँ?

देखते हैं हम रोज़ ख़बरों में
घोटाले लिखे हैं, जहां मर्ज़ी
अखबार का पहला पेज
बिकने के लिए बाज़ार बुलाए

हर जगह मिलता है कोहरा
किसी ऊंची इमारत की आखिरी मंज़िल
से नीचे झाँकने पर
लालच तेरा  इमान बुलाये

जमे हुए हैं सालों से
लोगों के पैर ढकोसलों में
गिरने पर, उठने की बजाय
इंसान गिर कर अकड़ दिखाए

पापी पेट के लिए तिजोरी
सफ़ल होने की रकम है जोड़ी !
कर्म-धर्म का मार्ग त्यागकर
गर्व से अपनी पहचान बताए।

क्या पता, फिर क्या होगा !


कंचों के दर्पण में देख

एक रोज़

व्यंग्य किया किसी निरक्षर ने

हिल जाएगी दुनिया

यदि धरा इन पर

फिसल गई तो

तेज़ भागेगी धरती

अरे पढ़ना कम पड़ेगा

 

लेकिन

सार्थकता तो उसने देखी

महसूस करी

फिर करी बयाँ 

 

यदि ख़त्म हो गई

चमकती-दमकती हरियाली

तो हिल सकती है दुनिया

नही रहेंगे पेड़ और पौधे

तो बचेगा दलदल

मज़बूत नहीं बचेगी माटी

तो फिसल सकती है धरती

 

साँसों की गिरावट से

प्रदूषण की मिलावट से

जनता सारी भूखी-प्यासी

अतृप्त सी धरती

 

भटकेगी कुछ खोजने के लिए

 

भागेगी बहुत तेज़

और जिन्होंने हरियाली उखाड़ी है

लोग दौड़ेंगे

उन्हें उखाड़ने के लिए

समय करेंगे तब भी नष्ट

और

पढ़ना कम पड़ेगा

 

क्यूँकि सोचने का भी वक़्त नहीं होगा

न कोई मंज़िल

न कोई ठिकाना

 

बस धंस जायेंगे

इन्ही पेड़ों के साथ

क्या पता

फर क्या होगा।


जीने दे

Sunday, 5 October 2014


जीने की तमन्ना है
ख्वाब सजा हुआ है यहाँ
आ ज़रा करीब से
खुशियों का सागर है जहाँ

जीने दे, जीने दे
इशारों से
दिशाओं में
घूमले तू जी भर के
जीने दे, जीने दे
हवाओं में
पनाहों में
उड़ ले तू जी भर के

ऐसा जो आज मोड़ आया है
ज़िंदगी में
इसपे चलने का ले मज़ा
खुदा की बंदगी में

खुदा की बंदगी
इशारों में आज
छिपे-छिपे से हैं सारे शिकवे

खोल के आज
देख आँखों से
छलके मन की हसरतें

जीने दे, जीने दे
इशारों से
दिशाओं में
घूमले तू जी भर के
जीने दे, जीने दे
हवाओं में
पनाहों में
उड़ ले तू जी भर के...

सैनिक

Saturday, 4 October 2014




किसके हाथों मज़बूर होकर
फैसला लिया थककर
चूर - चूर होकर

हालात ने करवट ऐसी बदली
समंदर का ख्वाब छोड़ो यारों
सरहद भी न हुई पार

इरादे नेक थे
मज़बूत थे हम भी
बुलंदियों को हासिल किया

पर

कुछ मज़बूर थे हम भी

क्यों कुछ इस तरह
ज़िंदगी हमसे गुमशुदा हुई

रेत में धूप से
तपन हुई पर चुभी नहीं
कि पैर इतने नर्म नहीं

तो फिर उस मज़बूरी में
ऐसा क्या था
कि ले लिया हम से सब कुछ
और किनारा भी नहीं मिला
चैन से सांस लेने को

था तड़पन से उदास जो चेहरा
वह भी झुलस गया

उस गर्मी का शिकार
दर्द भी बन गया
अश्रु नहीं निकल पाये
वे भी तो सूख गए

ऐसी भी क्या मज़बूरी थी
इतनी भी क्या दूरी थी !

चले तो थे फौलादी बन कर
सीमाएँ तोड़ीं कट्टर बनकर
सब त्यागा फिर कैदी बनकर

तब भागा सैनिक
और लज्जा हुई
मन के अंदर !

जागृत नहीं कर पाया खुद को
दिया वहीँ पर सब कुछ त्याग
प्राणो का बलिदान नहीं वह
डर के मर जाना कहलाया।

अब तो हुआ है
कोई सवेरा
लगता है मन होगा हल्का
जागा सैनिक फिर से मन का
छोड़ दिया मरने का धंधा।

अब तो उठो !
ओ ! जागो यारों !
होगा वह जो हम चाहेंगे
बुलंद आवाज़ उठाओ प्यारों
अन्याय का सिर हम काटेंगे।