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Stay Cool

If "Plan A" Didn't Work. The alphabet has 25 more letters ! Stay Cool. It's gonna be awesome.

The Struggler

Wednesday, 14 January 2015



In a pretty pink gown,
she was running downstairs,
with a flash back of all memories 
going on in her mind.


She had been upset all these days
due to her disagreed father
for her decision about her life.
He didn't want her to go.
He cared for her. He didn't allowed.

She struggled, made many efforts.
She knew it was very hard.
But she was always optimistic
in the times of great difficulty.

As the time passed, her father understood.
He was not in opposition.
He understood her struggle,
and allowed her for what she wanted.


People were going to clap for her.
Friends were waiting to enjoy with her.
Girls were ready to dance with her.

She came downstairs, and saw
only her life, her love, her fiance,
he gave her a bunch of flowers,
and there started a new struggle.


Thirsty man


He figured out the blush
on her beautiful face 
as he had spoken
some touching words.

She was smiling
with her face tilted
and looking at the floor.

He said, he was thirsty
before he got her into his life
and he meant it.
She sensed, his intent was to
dig his lips in hers.
She blushed more.
She thought, he meant to feel her.
She blushed even more.

He watched.

Suddenly, he spoke:
" I was thirsty for your single sight,
for you to come in my life,
for you to hold my hand,
for you to walk with me,
for you to take away my breath,
for you to jump in me,
and say,
you are mine."

She blushed a lot more.


जर्जर वकील


यूँ ही बैठा करते हैं अदालतों के शोर में
कि पैर बस भागने को उठ खड़े होते हैं

जहाँ बैठ मैं हर हकीकत से रूबरू हुआ
वहीँ उम्रकैद के फैसले पड़े होते हैं

हर नई उलझन कुछ ऐसी साजिश चलती है
उस माहौल में सारे सवाल अड़े होते हैं

क्या पता, रूह कहाँ पड़ी मिलेगी
लालची झूठ के पैगाम ज़्यादा बड़े होते हैं

दिन ढलता है, बात ख़त्म नहीं होती
बाहर देखो, चाय - पानी के इंतज़ाम खड़े होते हैं

वक़्त के साथ, मानवता भी मुरझा गई
इस पेशे में सारे मुकाम गिरे होते हैं

कहाँ मिलेगा न्याय, सफ़र बहुत बड़ा है
सबूतों की गड्डी लिए, बाहर अफसर खड़ा है

तेरी आँखों में धूल झोंकने आया हूँ
बोल तेरे इमान को कितने में नीलम करूँ ?

हर सच्चाई पर परतें पड़ गईं
परतों के भीतर बच्चे पल रहे होते हैं। 
 

क्यूँ हुईं आँखें नम और खामोश ज़ुबाँ ?


आँखें थीं नम और ज़ुबाँ थी खामोश
हर अश्रु के साथ, हर आह बह गई
ख्याल रखा उन्होंने इस दिल का सही तरीके से
कद्र करने में यूँ डूबे, कि बाहर आना भूल गए। 

देखा फिर हमने उन्हें, इन ठहरे झरोखों से
महसूस किया यूँ कि रच गए लहू में
सोचा था बहुत कुछ, आँखें न कह पाईं पर
ठहरा तो हर इक पल था, ओट में छिपकर चुपके से। 

दीदार किया उन्होंने जो, लज्जा ने घेर लिया
इज़हार और इकरार में दूरी न रह गई
इसलिए हुईं आँखें नम और खामोश ज़ुबाँ
वो हमारी ज़मीन हैं, और हम आसमान। 

Choice


Choice is not based on truth
but depends on morals,
our maturity and strength
to put color on corals.

Choice is a gate to mystery
from where the path begins,
we have to survive therein
for we have decided after checkings.

Choice brings us a life
what we have never lived,
comes mandatory satisfaction
and that gives - emotions zipped.

Choice makes positions clear
and mindset for strategies;
purpose is to dig throughout,
and here comes, fancies.

Choice is the power of man
to select his partner,
ability of mature person
to focus over laughter.

Choice is the key to success
and doors will open for you;
the calmer and peaceful you be
the more social s animal in you.

Choice makes a man perfect
to be able to react
over the question on his choice
in the public fun of cat.

Choice decides our attitude,
future with the loving ones.
Everything is predictable, 
when we care the caring sons.

Choice is the truth of life
never can be pretended over.
Depends upon the customer:
the more chosen, the more power.

शर्मीली

Saturday, 11 October 2014



वह क्यों यूँ शर्मा जाती है
क्यों इठलाती, इतराती है
पल भर में साया-सा दिखता
 छुपती है और मुस्काती है।

वह क्यों पास नहीं आती है
लाज से, देखो - बलखाती है
सुंदर युवती का मन है कि
नटखट नयन मिला जाती है।

पलकों के नीचे क्यों रंग है
गाल शर्म से लाल हो रहे
आहट सुनकर भागी जाती
केशों को लहरा जाती है।

उलझे-सुलझे बादल-से क्यों,
बाल हैं उसके घने-घने
पतली-पतली उँगलियों से
जल छिड़काकर उड़ जाती है।

धीरे से क्यों मुस्काती है
पलकें नीची किए शरम
गर्दन अपनी हिलाएगी फिर
चाल चलेगी बड़ी नरम।

चुपके से फिर भागेगी वो
दूर कहीं क्यों छिपती है
समझ नहीं पाई मैं अब तक
भाई से क्यों वो डरती है !!!

इश्क़ की वजह मिली...

Monday, 6 October 2014



नया समां है, इश्क़ नया है
आहिस्ते चलने की वजह मिली
कैसे सुनाऊँ मैं ये दास्ताँ
खामोशियों में पनाह मिली

जिस रास्ते पर तू मिला
साथ में फिर तू चला
उस राह पर बार-बार
चलने की वजह मिली


हर जीत जो मिली है उसमें
पल-पल तेरा प्यार समाया
इसी इश्क़ के कारण ही तो
दुआओं को मेरी, सफलता मिली

ठहरा तो हर एक पल था
जब तूने यूँ देखा था
ओट में छिपकर चुपके से
देखने की वजह मिली




महसूस करने लगी तुझे
हर लम्हे, हर ख्वाहिश में
तेरे जान लुटाने से
खूबसूरत लगने की वजह मिली

सोचती हूँ कई बार
आँखों से कहूँ, या ज़ुबाँ पर रखूँ
नज़रें नहीं उठ पाती हैं
मुँह की कलम, खाली मिली

हैं सभी परेशान मुझसे
मेरी आदतें हैं बदलीं
लोक-लाज और मर्यादा
की बातें दुश्मन ज़माने से मिलीं

फिर भी मुझको दुःख नहीं
तुझे याद करके है सुकून
तेरी बाहों में ही मुझको
सबसे प्यारी जगह मिली


क्या पता, तुझे चाहने की
सज़ा मिले या प्रशंसा
इन सब को दूसरी दुनिया में
भेज कर मुझे शान्ति मिली

तुझे चाहने का जी करता है
इधर-उधर जाऊँ तो भी
दिल बस यही सोचता है
कि रहने के लिए अब जगह मिली

तेरे साथ ही चलना है मुझको
तेरे साथ ही झड़ना है
तेरे पास में आने से
साँसों को जैसे राहत मिली।


खुद को मैंने सबका बताया...


मेरे आस-पास कुछ लोग रहते हैं
रहते हैं कई, पर कुछ ये कहते हैं
किसी को भी बना सकती हो दोस्त
किसी से भी कर सकती हो बातें
मन है साफ़ तुम्हारा जिसमें
हिम्मत करती हैं, दया-प्रेम की बातें

कुछ लोग मुझसे यह भी कहते हैं
दोस्त तुम्हारे हाथ में नहीं रहते हैं
यदि किसी ने तुम्हें धोखा दिया
तो उस दिन तुम्हें बड़ा मज़ा आएगा
जब कोई बड़ा , उन्हें मज़ा चखाएगा
और तुम्हारी हिम्मत के पेंच कसवाएगा

कुछ यह भी कहते कि जब तुम
उछलती-कूदती हो, अच्छी लगती हो
मुंह चिढ़ाकर, नज़र बचाकर, भागती हो
शैतानी करती हो, बच्ची लगती हो
जब बात मनवाने की ठान लेती हो
तभी उम्र की कच्ची लगती हो

पर कुछ दोस्त यह भी कह गए
शांत स्वभाव व सरल मिजाज़ की
यह है मूरत शालीन स्वभाव की
समझदार हो, आज्ञाकारी
करती हो बातें - सही अंदाज़ की
शर्मीली हो पर तेज़ दिमाग की

लोग यह नहीं समझ पाते हैं
कि समय के अनुसार बदलाव, स्वभाव में आते हैं
मैं तो बिलखते सुख में खुश होकर
रोते हुए भी चुभते आंसू पी सकती हूँ

मेरे व्यवहार से वह भी चुप है
जो मुझे तंग करने के बाद सम्भल गया

चुप रहकर ही आदर्शों की
सलाह को अपना मार्ग बनाया
सभ्य समाज में जीना सीखकर
हर इंसान को दोस्त बनाया
चाहे नर्मी हो या गर्मी
खुद को मैंने सबका बताया।

करी है दुआ !


हाथ जोड़कर
शीश झुकाकर
करी है दुआ

तेरे लिए ही
हर पल जीतने की
करी है दुआ

हर दम जिए तू
चाहे जो तू ,
मिले तुझे
करी है दुआ

तू कुछ ख़ास है
तू मेरे पास है
करी है दुआ

जो तूने कहा,
जो चाहा,
उसे पूरा करने की
करी है दुआ

बस तू आए
हर दिल में छाए
करी है दुआ



तुझमें ही मैं हूँ
मुझमें रहे तू
करी है दुआ
   
 

 
भूलना नहीं है तुझे
मेरे लिए है तू
करी है दुआ

तेरे लिए ही उसने
मुझको भेजा, जब
करी है दुआ।

किसे बुलाएं ?

जब होगा सुनसान अँधेरा
जमा हुआ भूतों का डेरा
तो हम भी भूत बन जाएँ
रौशनी करके किसको जगाएँ?

सब तो ठहरे हैं ये कायर
बुलंद आवाज़ कहाँ से लाएँ?
चाहते तो हम भी हैं पर
कमान चढ़ाने किसको बुलाएँ?

देखते हैं हम रोज़ ख़बरों में
घोटाले लिखे हैं, जहां मर्ज़ी
अखबार का पहला पेज
बिकने के लिए बाज़ार बुलाए

हर जगह मिलता है कोहरा
किसी ऊंची इमारत की आखिरी मंज़िल
से नीचे झाँकने पर
लालच तेरा  इमान बुलाये

जमे हुए हैं सालों से
लोगों के पैर ढकोसलों में
गिरने पर, उठने की बजाय
इंसान गिर कर अकड़ दिखाए

पापी पेट के लिए तिजोरी
सफ़ल होने की रकम है जोड़ी !
कर्म-धर्म का मार्ग त्यागकर
गर्व से अपनी पहचान बताए।

क्या पता, फिर क्या होगा !


कंचों के दर्पण में देख

एक रोज़

व्यंग्य किया किसी निरक्षर ने

हिल जाएगी दुनिया

यदि धरा इन पर

फिसल गई तो

तेज़ भागेगी धरती

अरे पढ़ना कम पड़ेगा

 

लेकिन

सार्थकता तो उसने देखी

महसूस करी

फिर करी बयाँ 

 

यदि ख़त्म हो गई

चमकती-दमकती हरियाली

तो हिल सकती है दुनिया

नही रहेंगे पेड़ और पौधे

तो बचेगा दलदल

मज़बूत नहीं बचेगी माटी

तो फिसल सकती है धरती

 

साँसों की गिरावट से

प्रदूषण की मिलावट से

जनता सारी भूखी-प्यासी

अतृप्त सी धरती

 

भटकेगी कुछ खोजने के लिए

 

भागेगी बहुत तेज़

और जिन्होंने हरियाली उखाड़ी है

लोग दौड़ेंगे

उन्हें उखाड़ने के लिए

समय करेंगे तब भी नष्ट

और

पढ़ना कम पड़ेगा

 

क्यूँकि सोचने का भी वक़्त नहीं होगा

न कोई मंज़िल

न कोई ठिकाना

 

बस धंस जायेंगे

इन्ही पेड़ों के साथ

क्या पता

फर क्या होगा।


जीने दे

Sunday, 5 October 2014


जीने की तमन्ना है
ख्वाब सजा हुआ है यहाँ
आ ज़रा करीब से
खुशियों का सागर है जहाँ

जीने दे, जीने दे
इशारों से
दिशाओं में
घूमले तू जी भर के
जीने दे, जीने दे
हवाओं में
पनाहों में
उड़ ले तू जी भर के

ऐसा जो आज मोड़ आया है
ज़िंदगी में
इसपे चलने का ले मज़ा
खुदा की बंदगी में

खुदा की बंदगी
इशारों में आज
छिपे-छिपे से हैं सारे शिकवे

खोल के आज
देख आँखों से
छलके मन की हसरतें

जीने दे, जीने दे
इशारों से
दिशाओं में
घूमले तू जी भर के
जीने दे, जीने दे
हवाओं में
पनाहों में
उड़ ले तू जी भर के...

सैनिक

Saturday, 4 October 2014




किसके हाथों मज़बूर होकर
फैसला लिया थककर
चूर - चूर होकर

हालात ने करवट ऐसी बदली
समंदर का ख्वाब छोड़ो यारों
सरहद भी हुई पार

इरादे नेक थे
मज़बूत थे हम भी
बुलंदियों को हासिल किया

पर

कुछ मज़बूर थे हम भी

क्यों कुछ इस तरह
ज़िंदगी हमसे गुमशुदा हुई

रेत में धूप से
तपन हुई पर चुभी नहीं
कि पैर इतने नर्म नहीं

तो फिर उस मज़बूरी में
ऐसा क्या था
कि ले लिया हम से सब कुछ
और किनारा भी नहीं मिला
चैन से सांस लेने को

था तड़पन से उदास जो चेहरा
वह भी झुलस गया

उस गर्मी का शिकार
दर्द भी बन गया
अश्रु नहीं निकल पाये
वे भी तो सूख गए

ऐसी भी क्या मज़बूरी थी
इतनी भी क्या दूरी थी !

चले तो थे फौलादी बन कर
सीमाएँ तोड़ीं कट्टर बनकर
सब त्यागा फिर कैदी बनकर

तब भागा सैनिक
और लज्जा हुई
मन के अंदर !

जागृत नहीं कर पाया खुद को
दिया वहीँ पर सब कुछ त्याग
प्राणो का बलिदान नहीं वह
डर के मर जाना कहलाया।

अब तो हुआ है
कोई सवेरा
लगता है मन होगा हल्का
जागा सैनिक फिर से मन का
छोड़ दिया मरने का धंधा।

अब तो उठो !
! जागो यारों !
होगा वह जो हम चाहेंगे
बुलंद आवाज़ उठाओ प्यारों
अन्याय का सिर हम काटेंगे।